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मैं हर दम ही हारा
बचपन से ले के जवानी तक
बस हारा ही हारा
बचपन खोया
सोचा जवानी मे मस्ती होगी
दिन रात एक किया
पढ़ाई कि
लिखाई कि
बोझ उठाये
जवानी का सज़ा धजा रथ बनाया
मगर ये कया जब रथ का एक पहिया देखा तो
मैं एक बार फिर हार
एक पहिये ने मुझे धोखा दिया
मुझे नही पता था
ये पहिया किसी और कि है
जब किसी और कि थी
तो फिर मेरी गड्डी मे आयी कयों
और आयी भी तो मुझे
पहले बतायो कयों नही
मुझे धोखे मे रखा
और जब पता चला तोमैं हारा ही हारा
मेरे पास आंसू के सिवा कुछ और नही
जिन्दगी ज़ीने मे कोई दम नही
कैसे कहूं पापा मम्मी को
कैसे कहूं भाई बहन को कोमुझसे कुछ बोला नही जाता
मुझसे कुछ कहा नही जातामैं कहने से भी हारा
बहुत सोचता हूँ
उसके बाद ज़ीने कि चाहत बनाता हूँ
एक बार जोश के साथ दिन कि शरुआत करता हूँ
कथा कहानी पढने के सिवा और अब कुछ कर भी नही सकता
सो दिन कट जाता है पढने मे
मगर रात को फिर वहीँ सवाल
रात को फिर वहीँ बिसाद
मैं बीसादो और अबसादो को सोच सोच के हारा
दो ही रास्ता है
या तो आत्म हत्या
या तो जिन्दगी को रो रो के जीना
आत्महत्या करने का साहस नही
रो रो के ज़ीने का मन नही
किसी से सहानुभूति कि इच्छा नही
बस मई यहीं सब सोच सोच के हारा
सच पूछिये तो मुझे लिखने का भी मन नही
लिखता हूँ बस जिन्दगी काटने के लिए
लिखता हूँ और पूछता हू कि
मैं कयों लिखता हूँ
मेरे लिखने का औचित्य कया हैं
मगर मैं तो इस प्रश्न के
जवाब से भी हारा
मैं हर दम ही हारा




