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कभी सोचता हूँ जिंदा कयोंहूं
मरता कयों नही
फिर गौर करता हूँ
तो लगता है मैं तो जिंदा लाश ही हूँ
लोगों को चलता फिरता दिखता हूँ
लोगों को हँसता खेलता दिखता हूँ
मैं तो जिन्दगी कि पनाह मे
हर रोज एक गुनाह करते दिखता हूँ
कोई उपाय नही
कोई रास्ता नही
सोचता बहुत हूँ
जिन्दगी को समझाता बहुत हूँ
मगर जिन्दगी के इस मुकाम पे
दिमाग का ज़ोर नही चलता है
दिल का बोलबाला हैं और
रोज जिन्दगी का एक नया मज़ामा लगता हैं ।
जिन्दगी कि कोई आश नही
धन दौलत कि प्यास नही
ऐशो आराम का शौक़ नही
मरने से खौफ नही
फिर भी मैं मरूंगा नही
मरूंगा कयों
अकेले खड़ा रहूँगा
दिखा दूंगा दुनिया को
अकेले कि जिन्दगी
रोता रहूँगा मगर
अपने ही क़दमों मे
जकडा रहूँगा




