आप ही बतायीए पढे कि छोड़ दें। आजकल कोई भी किताब उठाते हैं दो चार पन्ना पढते हैं फिर मुं न के रख देते हैं। नींद कि बात नही हैं। हमे ऐसे भी नींद बहुत कम आता हैं। बात है विचार कि बात है परिवर्तन कि । बात गम्भीर हैं सो आप थोडा सरलता से ही लीजियेगा नही तो सब सरसों का तेल हो जाएगा। कहने का मतलब ये हैं कि पता नही मेरे दिल के अन्दर बैठे सम्पादक के मन मे कया कया चलता रहता है जो हमे कुछ भी पढने से रोकता हैं । हाँ सम्पादक जी एक चीज़ पढने से नही रोकते है वो है कोक शस्त्र के महाग्रंथ। महाग्रंथ के अलावा अगर कुछ भी हाथ मे उठाता हूँ तो लगता है कि पाप कर रह हूँ। गजब कि बात है, अखिर हो गया ना परिवर्तन । यहीं मैं आज से पांच साल पहले मैं कोकशास्त्र उठाने से डरता था और आज कथा कहानी कि किताब छूने से डरता हूँ। सब उलट पुलट । परिवर्तन समाज का नियम हैं और हम भी तो समाज के ही एक अंग हैं सो ये तो होना ही था। अब समाज मे सर किया तो फिर ओखल से क्या डरना। हाँ तो मैं बात कर रहा था रुकने कि । आप को कया लगता हैं हम पढने से कयों रूक जाते हैं। पढने कि आदत नही । नही साहब हम तो बचपन से ही कथा कहनी के शौक़ीन रहे हैं , सो अपना आदत तो खराब नही है कमसे कम।
बात ये है कि हम जैसे ही किताब उठाते हैं तो लगता है पढने से मेरे सोच मे परिवर्तन आ जाएगा। हम उसी के अनुसार सोचने लगेंगें जिस अनुसार किताब के लेखक महोदय जी लिखेंगें। आप कहेगें सोचने के लिए तो हम फ्री हैं। आप बिल्कुल सही कहते हैं। हम फ्री हैं . मगर कभी आपने सोचा कि हम सोचते कैसे हैं. सोचने वाले कंप्यूटर का कंप्यूटर का पार्ट- पुर्जा कैसे बनता हैं. पार्ट – पूर्जा बनता हैं पढने लिखने देखने और सुनने से। और जब पढेंगे उपन्यास तो वहीँ सोचेंगें ना। जैसे जैसे लेखक लिखेगा मेरा भी दिमाग वैसे ही सोचेगा ।
लीक लीक गड्डी चले
लीक ही चले दिमाग।
हम नही चाहते हैं कि हमारा दिमाग लीक पर चलें। हम चाहते हैं कि हम पैदल धीरे धीरे किसी भी रास्ता से चलें। मगर दर इसी बात का है कि ना पढने के चक्कर मे रास्ता ना भटक जाएँ, या तो फिर रस्ते का ज्ञान अधूरा ना रह जाये या तो फिर काटों से बहरे पग पे चल पड़ें. आयेंगें । यहीं सब सोच के जायदा नही पढते हैं। मगर अब लगता है मन मार के पढना ही पड़ेगा। अगर मंज़िल तक पहूचना है, अगर लंबी दुरी तय करना हैं तो पढना भी जरूरी है । चलिए अभी नींद आ aहै फिर कभी पढते हैं। अभी इस लेख को,लिखने के पहले किताब तो उठाये थे मगर लिखने का बहाना बाना के आज भर के लिए टाल दिया हूँ। देखता हूँ कल सुबह तक पढने का जोश रहता है या फिर ठण्डा हो जाता है.
पढूं या सोचूँ
August 14, 2007 by nismar




