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Nismar

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तिकडम

August 14, 2007 by nismar

नही मेरी बहन नही । मैं भारत इस लिए नही आ रहा हूँ कयों कि मुझे मुम्मी पापा से प्यार है। हाँ तुम तीनो बहनो से मुझे प्यार है इस बात को इंकार नही कर सकता हूँ। तुम्लोगों को खुस देखना चाहता हूँ। जहाँ तक इस गरीब से जो बन पड़ा है मैंने किया है तुम्लोगों के लिए । और भविष्य मे अगर भगवन ने सकुशल रखा तो प्यार करता रहूँगा । नही मेरी बहन लुशी मुझे पैसा का तो बिल्कुल ही नही लालच है। लालच कब होता है। जब भविष्य से कुछ आशा हो। जब भविष्य के लिए कुछ सपने सपने सजाये हो । मेरे जीवन के सारे सपने चकनाचूर हो गए तो फिर धन दौलत गाडी बंगला का कया मतलब है मेरे लिए । आज से दो चार पहले पता नही था कि मुझे इन सब चीज़ का शौक़ है भी या नही मगर अब तो बिल्कुल साफ साफ कह सकता हूँ ही कि मुझे इन सब चीजों मे कोई शौक़ नही है। मात्रिवत परदारेसू पर्द्रव्यासु लोस्त्वत वाली बात हो गयी। मेरे लिए तो सब कुछ बसुधैब कुटुम्बकम । हाँ यहाँ अमेरिका मे जीवन आसान है और लोग भी अच्छे हैं, नौकरी भी मिल जायेगी अगर थोडा मेहनत कर के खोजा तो मगर मुझे मेहनत करने का मन ही नही। कया फायदा यहाँ रहने से अब। ऐसा लगता है जिन्दगी मे अगर अब मेरा थोडा बहुत कुछ है तो वो है मम्मी पापा और मेरी तिन बहने। सच पूछो तो मुम्मी पापा से से जयादा प्यार मैं तुम तीनो बहनो को करता हूँ। कभी बोला नही और ना ही कभी बोलोंगा। प्यार करने वाले कभी बोलते नही बस प्यार करते हैं। तुम लोग सोचती होगी कि मेरा भैया कैसा आदमी है आजतक पिछले २५ साल के इतिहास मे कभी भी कोई गिफ्ट नही दिया। यहाँ तक कि राखी के अवसर पर भी कभी साथ नही रहा। कया करूं लुशी मुझे गिफ्ट सीफ्त मे कोई बिस्वास ही नही है। ये सब मुझे फालतू पैसा का बर्वादी लगता है। तुम ही लोग सोचो ना हम लोग जहाँ से उठे हैं वहाँ पे गिफ्ट नाम कि कोई कोन्सेप्त ही नही है। अपने खेत मे जो काम करता है वो गनुरी जी कभी अपने बेटे के लिए कोई गिफ्ट लाए कया । नही ना। और वो झालारवा वाली अपनी बेटी कि शादी मे जैसा साड़ी ख़रीद के देना चाहती थी दे पायी कया । नही ना। इसका मतलब ये तो नही ना कि गनुरी जी और झालारवा वाली अपनी बच्चों से कम प्यार करती हैं। प्यार को गिफ्ट कि तराजू मे तो मूर्ख लोग तौलते हैं। प्यार को तोलना है तो समय कि तराजू से तौलो । अगर एक तराजू के एक पल्दे पर समय और दुसरे पर हमारा प्यार चढोआगे तो मेरा समय वाला पलारा भारी परेगा। याद है लुशी तुम जब सेवेंथ क्लास मे थी और मन क्लास दस मे था तभी से तुम्हारी मस्तेरगीरी करता आया हूँ। तुम्हारे थोडा आगे निकलने के तुरंत बाद बाकी दो बहनो कि भी पीछे पीछे मास्टर गिरी कि। भगवान ने मेरे अन्दर मास्टर गिरी का गुन जनम जात दिया हैं। और अब तो जिन्दगी भर मास्टर गिरी करने का ही सोचा हूँ। हाँ कुछ कुछ लिखते रहना एक मास्टर गिरी ही तो हैं। किसी को दिखे या फिर ना दिखे मुझे तो साफ साफ दिखता है। मास्टर गिरी और लिखना दोनो ही एक हैं। दोनो मे ही अपनी बात सामने वाले तक पहूचानी होती है। अगर आप अच्छा मास्टर हैं तो अच्छा लिखने वाले तो अपने आप हो जायेंगें। हाँ लुशी मन लिखते लिखते भटक जाता हूँ । लिखना शुरू करता हूँ किसी विषय पर और लिखते लिखते पहुच जता हूँ किसी और विषय पर . । लिखने के पहले ना तो कुछ पता होता है कि कया लिखना है और ना ही लिखने के अंत मे पता चलाता है कि कया लिख दिया। बस मन लगता है इसी लिए कुछ कुछ लिखते जाते हैं। द्दितो द्दितो मास्टर गिरी कि तरह । याद है जब भी तुमको कार्बनिक रसायन पढ़ाते थे तो मुझे कुछ पता नही होता था कि आज कया पढ़ाना है। बस मोटा वाला किताब उठाते थे और कहीँ से शुरू हो जाते थे। क्या पढना था और कया पढाया कुछ आता पता नही । बस इतना ही है कि कुछ कुछ पढाया। पढना अपने आप मे ही एक संतोष जनक कार्य है। हाँ तुम्हारी परीक्षा कि मुझे चिनता लगी रहती थी । वो तो आज भी हैं।
हाँ लुशी मुझे अब जिन्दगी से जयादा कुछ लेना देना नही है। ना तो मोह माया है और ना ही लोभ लालच । बिल्कुल आज़ाद हूँ। ना तो किसी का दर है और ना ही किसी का उतर दायित्व . जो मन मे आएगा करेंगें जब तक मन करेगा जियेंगें। जैसे मन करेगें जियेंगें। अगर सब कुछ अच्छा रहा तो पापा मम्मी भी उदास नही होंगें। मैं कोसिस करूंगा किसी को उदास नही करूं। मगर अब मेरी जिन्दगी भगवान् भरोसे हैं। एक बात है जब से अपनी जिन्दगी भगवन के हाथों मे दिया है तब से ज़ीने का मज़ा दुगुना हो गया है। मैं तो कहता हूँ लुशी तुम भी अपनी जिन्दगी भगवन के हाथों मे सौप दो। मगर तुम तो वो भी नही कर सकती। भारत जैसे देश मे लडकी होने का यहीं सबसे बड़ा दोष है। नही नही तुम्हारा दोष नही है दोष तो समाज का है। हम तो अपनी मरजी का कर सकते हैं भगवन को अपना घरवाली सवीकार कर सकते हैं मगर तुम तो बाध्य हो किसी और को भगवन कहें के लिए। मुझे ये भी पता है कि आनेवाला भगवन वैसा नही होगा जैसा कि तुम सोच रही होगी । मैंने दुनिया को देखा है परखा है एक भी आदमी सही का नही मिलता है। सब के सब बस ऐसे ही है। सब कोई तिकडम मे लगे हैं। अब कया कर सकती हो जब पूरी दुनिया ही तिकडम है तो तुम्हए भी तिकडम मे शामिल होना पड़ेगा ना । भारत आते ही तुम्लोगों के तिकडम के लिए भी तिकडम करना हैं। भगवन कि किरपा से कोई तिकडम अगर जल्दी मिल जाये तो बहुत अच्छा रहेगा। हम और पापा कोसिस तो पूरा तिकडम करेंगें कि तुम्हारे लिए अच्छा तिकडम खोज के लायें। अब सारा संसार ही तिकडम है तो हमलोगों को भी तिकडम करना ही पड़ेगा ना। हां पैसा वाली बात । मेरे ख़याल से घर पे कुछ पैसा तो है ही और एक दो साल मे मैं भी कुछ कमा लूँगा और पापा तो कुछ कुछ कमा ही रहे हैं। अगर जयादा कुछ पंगा हुआ तो सारा खेत सेट बेच देंगें । मुझे नही चाहिऐ पैसा। मगर एक बात लुशी जितना जयादा पैसा उतना खराब तिकडम । अगर तिकडम अच्छा है तो फिर पैसा कयों मांगता हैं। मैं अपने आप को जानता हूँ मैं अच्छा हूँ , अपने आप को जानता हूँ , मैं तो पैसा कि बात कभी नही करता । चलो लुशी फिर कभी बात करते हैं जैसे ही घर आते हैं।

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