नही मैं खड़ा रहूँगा । चलने दो आंधी । आने तो बारिस। मैं नही डरता बारिस से। सबको देख लूँगा। जो हो रहा है सब झेल लूँगा। जब इतने दिनों तक सब झेला ही है तो आगे भी झेल लूँगा । साला जिन्दगी मे अब बचा ही क्या है। जैसे आएगी वैसे जी लूँगा। मानता हूँ कि मदद करना अच्छी आदत है। और आदमी कि सही पहचान भी विपत्ति के घड़ी मे ही होती है। मैंने कौन गलती कि थी जो भगवान् मेरे को सज़ा दे रहा है। हे भगवन तू ही बता मैंने कया गलती कि थी। मैं जानता हूँ तू चुप रह जाएगा। तेरे पास कोई जवाब ही नही है। तू बिना कुछ सोचे समझे मेरे साथ ना इन्साफी कर दिया । मगर मैं तुमको छोड़ने वाला नही हूँ। तू मेरे से बच नही पायेगा। तू कया समझाता है मैं हार जाऊँगा। अगर तू ऐसा समझ रहा है तो बहुत बड़ी भूल है । मैं तुमको दिखा दूंगा कि दुनिया मे आदमी अकेले रह सकता हैं। ये मेडिकल वाले लोग कया समझते हैं कि अकेला आदमी नही रह सकता है। मैं उनके मेडिकल विज्ञानं को चैलेंज करता हूँ। अगर किसी माय के लाल मे दम है तो फिर मेरा चैलेंज स्वीकार करे । मैं दिखाता हूँ कि उनका मेडिकल विज्ञानं मेरे सामने अभी पिद्दी हैं। मुझे पता है कि मेरे ज़ीने का कोई उद्देश नही है ,मुझे पता है कि दुनिया मे मेरा कोई नही है। मगर फिर भी मैं जी के दिखा सकता हूँ। ज़ीने कि तो बात ही छोड़ दो मैं सावित कर सकता हूँ कि सबसे अच्छा जिन्दगी अकेले का जिन्दगी है।
Posted by Nismar at 6:43 PM
अकेलापन
August 14, 2007 by nismar




