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Nismar

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कोयला

August 13, 2007 by nismar

मुझे लगता है मेरी जिन्दगी मेरे हाथ से निकली जा रही है। नही नही निकल तो पहले ही चुकी है। जिन्दगी का तो बैंड बाजा उसी दिन बज गया था जिस दिन कि मेरी प्रेमिका ने मुझे धोखा दिया था। ऐसे तो कभी कभी मन बहुत अच्छा रहता हैं मगर जैसे ही इस बात का अहसास होता है कि मेरी जिन्दगी मेरे हाथ से निकल चुकी है अपने आप पे रोना आ जाता है। लगता हैं अब करें तो कया करें। किसके लिए करें। कयों करें । बहुत बार मुम्मी पापा भाई बहन घर बार का बहाना बना के अपने आप को धोखा देने का प्रयास किया मगर कोई फायदा नही। ये सब बहने तात्कालिक ख़ुशी दे सकते हैं मगर लंबी वाली खुसी तो मेरे जीवन से विदा ले चुकी है। कई बार मैंने खुसी को भी चैलेंग करने का कोसिस किया । कान्फुसिय्स कि जैसे लोगों कि जिन्दगी से सबक लिया और मान लिया कि ख़ुशी जिन्दगी का कोई हिस्सा नही है। रो रो के भी हँसा जा सकता है। और तो और कुछ विद्वानो का मानना है कि आदमी दुःख के हालत मे सबसे जयादा खुस होता है। ये फिलोस्फेर लोग भी गजब के लोग हैं, अपने आप को खुस करने के चक्कर मे दुनिया को गुमराह कर रहे हैं। ऐसे तो मैं भी कह सकता हूँ कि ख़ुशी जिन्दगी का अन्तिम लक्ष्य नही है। इसका ये मतलब थोड़े ना हुआ कि हम फिलोश्फेर हो गए। और इसका ये भी मतलब नही हुआ कि बाकी सभी लोग बेब्कूफ हैं जो ख़ुशी कि तलाश मे सुबह घर से दफ्तर के लिए निकलते हैं और शाम को अपने थैली मे चार किलो ख़ुशी ले के लौटते हैं। अब समझ मे आता है कि साधारण आदमी का जीवन कितना अच्छा होता है।

अगर फिर से कोई मुझे साधारण आदमी कि जिन्दगी लौटा दे तो मैं अपनी जीवन भर कि कमी दे दूं। मगर दुर्भाग्य यहीं कि भगवन खुसी का हिसाब किताब लगते समय पैसा को अलग रखा । भगवान् जी भी कया करते हैं आप। सब चीज़ को तौलने के लिए खुसी का तराजू बनाया और जब खुसी तौलने कि बात आयी तब आपका पैसा रूपी तराजू फेल हो गया। हे भगवन जी हम एक रिसर्च के विद्यार्थी हैं अगर आप बोलिए तो ख़ुशी तोलने वाला तराजू बना दूं। बस आप उधेर नरक से तराजू प्रोजेक्ट के लिए फंड भेजिए और हम इधर काम शुरू करते हैं। दुनिया के सबसे धासु युनिवर्सिटी मे इस प्रोजेक्ट को अंजाम देंगें, ये मेरा वादा है आपसे। आप मेरी बुद्धि को नही जानते हैं। मैं बचपन से ही तेज विद्यार्थी रहा हूँ। आज भी जब मेरे गाव के आस पास कोई बच्चा नही पढता है तो गुरू जी बोलते है ” हे बालक पढ़ाई मे मन लगाओ नही तो वो आ जाएगा “। वो कहने का तात्पर्य मेरे से ही है।

मुझे आज भी याद है मोदी जी के दुकान पर जब भी गया तो लोग मेरी तरफ काफी ही सम्मान जनक आंखो से देखे। मोदी जी ने तो कई बार मेरे सामने मेरी प्रसंषा कि। एक बार बोले अरे गनूरी यहीं अर्जुन बाबू का लड़का , बड़ा होनहार है। ऐसा लड़का १० किलो मीटर के वृत्त मे ना तो हुआ है और ना ही होने जा रहा है। लड़का है एक दम हिरा। आज जब उस हीरे के बारे मे सोचता हूँ तो आंख भर जाती है। बड़ा उम्मीद था मोदी जी को। मेरे उपर बहुत नाज़ था गनोरी जी को । हीरा निकला तो ज़रूर कोयले कि खान से मगर रास्ते मे कुछ लोग ऐसे मिले जो कि बिना कुछ सोचे समझे हीरा को मैला कर दिए। खैर जिन्होंने इस हीरा को मैला किया उनको भी मैं कोई दोष नही देता हूँ। जो भाग्य मे लिखा है उसको कौन टाल सकता है। अगर हीरे के नसीब मे कोयला बनना लिखा था तो वो कोयला ही बनेगा ना। लोगों को बड़ा उम्मीद था कि बड़ा हो के हीरा समाज के लिए कुछ करेगा। गाव मे स्कूल खोलेगा, गाव मे फैक्ट्री खोलेगा। उधेर हीरा चमकेगा और इधेर गाव मे दिया बत्ती होगी। मगर अब ये हीरा हीरा रहा ही नही तो चमकेगा कया खाक । अब ये है कोयला , एकदम काला कोयला ।

 कोयला चमकता नही है कोयला जलता है। मुझे जलने मे भी कोई आपति नही है। जहाँ चाहो मुझे जला दो। मैं खुसी से जलने को तैयार हूँ। मगर मुझे पूरा बिस्वास है इस कोयले कि आंच एक रोटी भी पका दे। फिर भी जो भी है मैं अपने तरफ से जलने का पूरा कोसिस करूंगा। कोयला का काम है जलना । खाना पकता है कि नही वो तो बाद कि बात है। अगर कोयला बिना जले दम तोड़ दे तो वो तो गोइथा से भी बदतर है। कोयला देखने मे पत्थर जरूर लगता है मगर अन्दर से उसमे गोइथा से भी कम ताकत होती है। इस बात का अनुभव किसी को जानना है तो उस कोयले से जा के पूछे जो कि पहले हीरा रह चूका है। उस कोयले ने अपने अच्छे दिनों मे हीरे कि कडा पं न भी देखा है और बुरे दिनों मे गोइठे कि मुलाय्मता भी। ये कोयला ही है जो हीरे और गोइथा को मे समाज को अन्तर बता सकता है। नही मैं जलूँगा । मैं ऐसे दम नही तोड़ सकता मुझे मोदी जी कि लाज रखनी है मुझे गनोरी को बताना है कि ये वहीं हीरा है जो आज से २० सल् पहले मोदी जी के दुकान से लेमन चूस ख़रीद के ले गया था.

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