साहब आप अपने बच्चे को क्या बनाना चाहते है। दो उत्तर हैं – शेर या गीदड़ । आप कहेंगें ये कैसा सवाल हैं। कौन बेबकूफ बाप होगा जो अपने बच्चे को गीदड़ बनाना चाहेगा। मगर साहब दुर्भाग्य इसी बात का है कि आप ना चाहते हुए भी अपने बच्चे को गीदड़ बना रहे हैं। मैं कोई अलग चक्की का पिसा हुआ नही हूँ। मैं भी गीदड़ ही हूँ। मेरे बाबु जी चाहते तो थे कि मेरा पुत्र शेर बने । एक दम से असली शेर । मगर वो हो नही सका । और अब ये आलम है । होता भी कैसे पढने मे इतने मशगूल हो गए कि हम तो भूल ही गए कि हम शेर बनने के लिए पढ रहे है। क्लास एक से क्लास दो , क्लास दो से क्लास चार और क्लास चार से क्लास दस धडाधड पार करते गये । दौड़ भाग मे किसको कहा खबर कि किसे क्या बनना है। मेरे साथ भी बही हुआ जो सबके साथ होता है । साहब मैं सच बोलता हूँ , ये पढ़ाई लिखाई से आदमी गीदड़ ही बनता हैं। गीदड़, शत प्रतिशत गीदड़। जितना जयादा पढो उतना अच्छा गीदड़। अपको बिस्वास नही आ रहा होगा । हम सावित कर के दिखा सकते हैं।
अच्छा चलिये सावित करने कि कोसिस करते हैं। मान लोजिये कि हम बिल्कुल देहाती अनपढ़ गवार हैं। लिख लोधा पढ़ पत्थर सोलह दूनी आठ। अब हम जैसे जाहिल गवार कभी कभी कभी बाज़ार तो जाते ही हैं। कभी कभी बस मे भी बैठते हैं। एक रोज मान लीजिये कि मैं बस मे बैठ के पटना के सफ़र पे निकल गया हूँ। खुदा ना खास्ते रस्ते मे दुर्घटना हो गयी। एक बस दुसरे बस से जा के टकरा गया। मगर आल्लाह का शुकिरिया अदा कीजिये कि किसी को कुछ हुआ नही सभी सही शालामत। किसी किसी को थोड़ी बहुत चोट आयी। किसी का माथा फट गया , किसी का हाथ टूट गया, कोई इधेर रो रह है, कोई उधेर गा रह है, तो कोई उधेर भगा जा रहा है। अल्लाह कि दया से मेरे हाथ पैर सही सलामत हैं। मेरे बगल के शीट पे बैठे साहब जी तो पूरे भले चंगे हैं। हाँ थोडा उनकी शर्ट मे खरोच आया है।
मैं अफरा तफरी मे दौड़ के एक भाई साहब को उठाया । कराह रहे थे। लगता है जोर कि चोट आयी है। हॉस्पिटल ले जाना पड़ेगा। जितना जल्दी हॉस्पिटल के घाट पहुचा दो उतना ही अच्छा। भाई साहब का वेट भी तो १०० किलो है। हमसे अकेले उठा पाना . ना बाबा ना . अरे उधेर से एक बस आता दिखाई दिया। चलो इसी बस मे बैठा देते हैं भाई साहब को । पटना हॉस्पिटल मे भर्ती हो जायेंगें। बचेगें तो देश के काम आयेंगें। मैंने यहीं सोच एक भाई साहब को आवाज़ लगायी। भाई साहब पढे लिखे लगते हैं . अरे ये तो वहीँ हैं जो मेरे साथ बस मे मेरे बगल के शीट पे बैठे थे . भाई साहब जरा इधेर आयिये थोडा पीड़ित कि सेवा मे मदद कीजिये॥ मैंने ऐसा आग्रह किया। बेचारे कि जान बच जायेगी तो भगवन आपका सुकर करेगा। अरे बाप ये कया। साहब जी का जवाब तो सुनिये । बोलते है उनका १० बजे से ऑफिस है पहले ही दुर्घटना के करण आधा घंटा लेट हो गए हैं। अगर हम सब को उठाने लगे तो कितना लेट हो जायेंगें मेरे समय कि किसी को चिन्ता नही तो हम कयों किसी कि चिन्ता करें . मैं तो दंग रह गया साहब कि बात सुन के। साहब जी बस पकड़े और फिर ऑफिस चल दिए।
और उसी दिन मेरा तथ्य सवित हो गया कि पढ़ाई आदमी को गीदड़ ही बनाती है शेर नही।,
मैं अपना यही तथ्य को मन मे रखते हुए अमेरिका पहोचा। भगवन कि दया है कि जहाग पे बैठा के फ्री फंट मे अमेरिका कि शैर कराया । कैसे कराया कयों कराया और कब कराया ये सब कि कहानी बहुत लंबी है। जिन्दगी बची तो एक एक को चूं न चूं न के लिखेंगें। आप चिन्ता मत कीजिये आप बस पढ़ते जयिये फिर देखिए कमाल कया से कया होता है। पूरे भारत को बदल के रख देंगें। सब साला उल्टा पुल्टा चल रह है। जिसको जो मन मे आ रहा हैं कर रहा है ।
हाँ तो मैं अभी अमेरिका मे था । जब अमेरिका पहोचा तो एक अजब कि बात देखने को मिली। मैं तो अमेरिका के जंगल मे आ के एकदम से पागल हो गया। एक भी गीदड़ नही। जिसको देखो वहीँ शेर । जो यहाँ जन्मा है वो तो असली शेर है और जो किसी दुसरे जंगल से भाग के आया है वो भी शेर बनने कि कोसिस कर रह है। नही नही पढ़ाई लिखाई वाले शेर कि बात नही कर रहा हूँ । हम बात कर रहे हैं जैसे कि आप कैसे रहते हैं, आप कैसे बात करते हैं, आप लोगों के बारे मे क्या सोचते हैं, आपका विचार कैसा है टाईप वाले शेर कि।
मैंने बहुत गौर किया । बहुत सोचा कि ऐसा कैसे हो गया। जिसको देखो वहीँ शेर। बहुत रेसेर्च के बाद पता चला कि कि ये सब पढ़ाई का कमाल है। मैंने एक स्कूल मे छान बिन कि। बच्चों से पूछा। पता चला कि उनके उपर तो पढ़ाई का लोड भारत का आधा भी नही है। बच्चों को किताब कम पढाया जाता और ये जयादा सिखाया जाता कि किताब पढने के अलावे और बहुत से चीज़ हैं सिखने को।
कुछ और बच्चे से पूछा सभी ने यहीं बोला। मास्टर्स से पूछा उसका भी यहीं जवाब । किताब पढने से नौकरी मिलती हैं और अगर आदमी बनना है तो किताब कि कम और प्रक्टिकल ज्ञान कि जयादा जरूरत है। हम लोग आदमी बनाते हैं वैज्ञानिक नही ।
तब जा के बात सब साफ साफ हुआ। जा के लगा के हमारे बाबूजी ने थोड़ी गलती कि है। हम मानते हैं कि उनके पास और दुसरा कोई रास्ता नही था। मगर थोडा बहुत तो प्रक्टिकल ज्ञान पे ध्यान दे ही सकते थे । हम पूरा शेर भले ना बनते मगर शेर कि तरह दहाड़ तो सकते। ऐसे कया, जहाँ जाओ भीगी बिल्ली कि तरह दुबक जाओ। कहॉ कया हो रह इस से कुछ मतलब ही नही। कौन जिए कौन मरे मेरे बाप का क्या जाता है। ये भी कोई बात हुई। आप ही बताये साहब , कुछ ना कुछ तो गलत जरूर हैं । और गलती को थिक भी आप ही कर सकते हैं। मुन्ना के बाबूजी आप ही हैं और मुन्ना देश का कर्णधार ।
बस इसी आशा मे कि आने वाला हर मुन्ना पहले आदमी बने फिर नौकरी ।
जय सिया राम




